पाश की एक कविता

हम लड़ेंगे साथी,
उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी,
गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी,
जिंदगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है
उदास निहाई पर हल की लीकें
अब भी बनती हैं, चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता,
सवाल नाचता है
सवाल के कंधों पर चढ़ कर
हम लड़ेंगे साथी.
कत्ल हुए जज्बात की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हाथों पर पड़ी गांठों की कसम खाकर
हम लड़ेंगे साथी

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